मेघदूत: "नीचैर्गच्छत्युपरि दशा चक्रनेमिक्रमेण"

समर्थ शिष्या अक्का : "स्वामीच्या कृपाप्रसादे हे सर्व नश्वर आहे असे समजले. पण या नश्वरात तमाशा बहुत आहे."

G C Lichtenberg: “It is as if our languages were confounded: when we want a thought, they bring us a word; when we ask for a word, they give us a dash; and when we expect a dash, there comes a piece of bawdy.”

C. P. Cavafy: "I’d rather look at things than speak about them."

Martin Amis: “Gogol is funny, Tolstoy in his merciless clarity is funny, and Dostoyevsky, funnily enough, is very funny indeed; moreover, the final generation of Russian literature, before it was destroyed by Lenin and Stalin, remained emphatically comic — Bunin, Bely, Bulgakov, Zamyatin. The novel is comic because life is comic (until the inevitable tragedy of the fifth act);...”

सदानंद रेगे: "... पण तुकारामाची गाथा ज्या धुंदीनं आजपर्यंत वाचली जात होती ती धुंदी माझ्याकडे नाहीय. ती मला येऊच शकत नाही याचं कारण स्वभावतःच मी नास्तिक आहे."

".. त्यामुळं आपण त्या दारिद्र्याच्या अनुभवापलीकडे जाऊच शकत नाही. तुम्ही जर अलीकडची सगळी पुस्तके पाहिलीत...तर त्यांच्यामध्ये त्याच्याखेरीज दुसरं काही नाहीच आहे. म्हणजे माणसांच्या नात्यानात्यांतील जी सूक्ष्मता आहे ती क्वचित चितारलेली तुम्हाला दिसेल. कारण हा जो अनुभव आहे... आपले जे अनुभव आहेत ते ढोबळ प्रकारचे आहेत....."

Kenneth Goldsmith: "In 1969 the conceptual artist Douglas Huebler wrote, “The world is full of objects, more or less interesting; I do not wish to add any more.”1 I’ve come to embrace Huebler’s ideas, though it might be retooled as “The world is full of texts, more or less interesting; I do not wish to add any more.” It seems an appropriate response to a new condition in writing today: faced with an unprecedented amount of available text, the problem is not needing to write more of it; instead, we must learn to negotiate the vast quantity that exists. How I make my way through this thicket of information—how I manage it, how I parse it, how I organize and distribute it—is what distinguishes my writing from yours."

Tom Wolfe: "The first line of the doctors’ Hippocratic oath is ‘First, do no harm.’ And I think for the writers it would be: ‘First, entertain.’"

विलास सारंग: "… . . 1000 नंतर ज्या प्रकारची संस्कृती रुढ झाली , त्यामध्ये साधारणत्व विश्वात्मकता हे गुण प्राय: लुप्त झाले...आपली संस्कृती अकाली विश्वात्मक साधारणतेला मुकली आहे."

Tuesday, May 01, 2012

Of Zohra and Achla: अभीभी जोहरा-जबी और जवान...

Louis-Ferdinand Céline:

"I had tried to lose myself. I hadn't wanted to be face to face with my own life any time, but everywhere I kept finding it. I was always coming back to myself. My wanderings were over. No more knocking about for me...The world had closed in...We had come to the end! Like at the carnival! It's not enough to be sad; there ought to be some way to start the music up again and go looking for more sadness...But not for me...We may not admit it, but what we really want is to have our youth back again..."

('Journey to the end of the night', 1932)


ज़ोहरा सैगल:

"
ज़िंदगी का कुछ पता नहीं. कब क्या हो जाए."

"we really want is to have our youth back again"...most of us aren't as lucky as Yayati (ययाति)...but we somehow want it back...youth...जवानी...तारुण्य...but better if we felt young at any age..."Just now I am young"..."अभी तो मैं जवान हूँ"...

One of the most memorable moments for me, on TV, has been watching Zohra Sehgal's rendition of Hafeez Jalandhari's (हफ़ीज़ जालंधरी) 'Abhi To Main Jawan Hoon'(अभी तो मैं जवान हूँ) at the request of program host Khushwant Singh.

The way her eyes on wrinkled face twinkled, the way she gestured, especially with hands, and the way Mr. Singh received it...Was the interview just an excuse to get her to sing the song?...Like arranging a concert just for the finale with Raag Bhairavi...It was surreal...


Photo courtesy: The Hindu

There is another lovely story associated with this song.

People used to ask the late P L Deshpande (पु ल देशपांडे) if the character of Kakaji (काकाजी) from his very popular play 'Tujhe Ahe Tujapashi', 1957 (तुझें आहे तुजपाशीं)was based on the real life figure of Ramubhaiya Date (रामुभैया दाते).

Pu La used to answer: "Kakaji in the play keeps saying 'I am still young' ('अभी तो मैं जवान हूँ') but here (in case of Mr. Date) the childhood (शैशव) itself is still not over!"

The same could be safely said of Ms. Sehgal the way she winked at the camera in a recent TV interview.

Irrespective of what else she has done, the fact that she choreographed Guru Dutt's Baazi (1951) and the dream sequence song in Raj Kapoor's 'Awaara' (1951) tells us about her abundant talent.

She turned 100 on April 27 2012!

Ms. Sehgal told BBC, Hindi in 2009: "चेतन आनद और राजकपूर को मैं कभी नहीं भुला सकी." (I could never forget Chetan Anand and Raj Kapoor.)

Many of Mr. Anand's films features Ms. Achala Sachdev (अचला सचदेव) (b. 1920), a beauty with a distinct voice until she started doing roles of weeping widows.

Ms. Sachdev, at the centre, in Chetan Anand's 'Heer Raanjha', 1970

Of course, Ms. Sachdev will be most remembered for featuring in a wonderful song: 'Ae Meri Zohra Jabeen' (एह मेरी जोहरा-जबी) from Yash Chopra's 'Waqt', 1965.

In April 2012, Indian media- both electronic and print- celebrated 100th birthday of much-decorated Padma Vibhushan Ms. Sehgal while Ms. Sachdev died, largely forgotten, in a Pune hospital on April 29 2012.

Zohra and Achla, they both will always be my darlings!

एह मेरी जोहरा-जबी, तुझे मालुम नही
तू अभी तक है हसी और मै जवान
तुझपे कुर्बान मेरी जान मेरी जान
एह मेरी जोहरा-जबी

ये शोखिया ये बचपन,
जो तुझ मे है कही नही
दिलो को जीतने का फेन, जो तुझ मे है कही नही
मै तेरी
मै तेरी आंखो मे पा गया दो जहा
एह मेरी जोहरा-जबी

तू मीठे बोल जान-ए-मन,
जो मुस्कुराके बोल दे
तो धध्कानो मे आज भी,
शराबी रंग घोल दे
ओह सनम
ओह सनम मै तेरा आशिक-ए-जाविदा

एह मेरी जोहरा-जबी

(lyrics by Sahir Ludhianvi)

अभी तो मैं जवान हूँ (3)
हवा भी ख़ुशगवार है, गुलों पे भी निखार है
तरन्नुमें हज़ार हैं, बहार पुरबहार है
कहाँ चला है साक़िया, इधर तो लौट इधर तो आ
अरे, यह देखता है क्या? उठा सुबू, सुबू उठा
सुबू उठा, पयाला भर पयाला भर के दे इधर
चमन की सिम्त कर नज़र, समा तो देख बेख़बर
वो काली-काली बदलियाँ , उफ़क़ पे हो गई अयाँ
वो इक हजूम-ए-मैकशाँ, है सू-ए-मैकदा रवाँ
ये क्या गुमाँ है बदगुमाँ, समझ न मुझको नातवाँ
ख़याल-ए-ज़ोह्द अभी कहाँ? अभी तो मैं जवान हूँ (3)

इबादतों का ज़िक्र है, निजात की भी फ़िक्र है
जनून है सबाब का, ख़याल है अज़ाब का
मगर सुनो तो शेख़ जी, अजीब शय हैं आप भी
भला शबाब-ओ-आशिक़ी, अलग हुए भी हैं कभी
हसीन जलवारेज़ हो, अदाएं फ़ितनाख़ेज़ हो
हवाएं इत्रबेज़ हों, तो शौक़ क्यूँ न तेज़ हो?
निगारहा-ए-फ़ितनागर , कोई इधर कोई उधर
उभारते हो ऐश पर, तो क्या करे कोई बशर
चलो जी क़िस्सा मुख़्तसर, तुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़र
दरुस्त है तो हो मगर, अभी तो मैं जवान हूँ (3)

न ग़म कशोद-ओ-बस्त का, बुलंद का न पस्त का
न बूद का न हस्त का, न वादा-ए-अलस्त का (2)
उम्मीद और यास गुम, हवास गुम क़यास गुम
नज़र से आस-पास गुम, हमां बजुज़ गिलास गुम
न मय में कुछ कमी रहे, कदा से हमदमी रहे
निशस्त ये जमी रहे, यही हमा-हमीं रहे
वो राग छेड़ मुतरिबा (2), तरवफ़िज़ा आलमरुबा
असर सदा-ए-साज़ का, जिग़र में आग दे लगा (3)
हर इक लब पे हो सदा, न हाथ रोक साक़िया
पिलाए जा पिलाए जा, पिलाए जा पिलाए जा

अभी तो मैं जवान हूँ (3)

ये ग़श्त कोहसार की, ये सैर जू-ए-वार की
ये बुलबुलों के चहचहे, ये गुलरुख़ों के क़हक़हे
किसी से मेल हो गया, तो रंज-ओ-फ़िक्र खो गया
कभी जो वक़्त सो गया, ये हँस गया वो रो गया
ये इश्क़ की कहानियाँ, ये रस भरी जवानियाँ
उधर से महरबानियाँ, इधर से लन्तरानियाँ
ये आस्मान ये ज़मीं (2), नज़्ज़राहा-ए-दिलनशीं
उने हयात आफ़रीं, भला मैं छोड़ दूँ यहीं
है मौत इस क़दर बरीं, मुझे न आएगा यक़ीं
नहीं-नहीं अभी नहीं, नहीं-नहीं अभी नहीं

अभी तो मैं जवान हूँ (3)

(courtesy: BBC Hindi)